कैसे तीन ऋषियों ने अपनी प्यास बुझाने के लिए यहाँ मानसरोवर का जल प्रकट किया।
उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में स्थित नैनीताल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस खूबसूरत झील का इतिहास हजारों साल पुराना है? हिंदू पुराणों में नैनीताल की इस झील को ‘त्रि-ऋषि सरोवर’ के नाम से पुकारा गया है।
आज के इस लेख में हम उस दिव्य और प्राचीन कहानी के बारे में जानेंगे, जो नैनी झील की उत्पत्ति (Origin of Naini Lake) से जुड़ी है।
जब प्यास बुझाने के लिए ऋषियों ने किया कठिन तप
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में तीन महान ऋषि— ऋषि अत्री, ऋषि पुलस्त्य और ऋषि पुलह— तीर्थयात्रा के उद्देश्य से हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में घूम रहे थे। चलते-चलते वे उस स्थान पर पहुँचे जिसे आज हम नैनीताल कहते हैं।
उस समय यहाँ कोई झील नहीं थी, बल्कि यह एक पथरीला और सूखा इलाका था। लंबी यात्रा के कारण तीनों ऋषियों को बहुत तेज प्यास लगी, लेकिन आस-पास पानी का कोई स्रोत मौजूद नहीं था। ऋषियों ने अपनी दिव्य शक्ति और अंतर्मन से जल की खोज की, मगर उन्हें निराशा हाथ लगी।
मानसरोवर के जल से भरी गई झील
प्यास से व्याकुल होने के बावजूद ऋषियों ने धैर्य नहीं खोया। उन्होंने संकल्प लिया कि वे यहाँ जल प्रकट करेंगे। कथा के अनुसार:
- ऋषियों ने एक बड़ा गड्ढा (गर्त) खोदा।
- अपनी तपस्या के बल पर उन्होंने तिब्बत की पवित्र मानसरोवर झील का ध्यान किया।
- ऐसा माना जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मानसरोवर का पवित्र जल उस गड्ढे में प्रवाहित होने लगा।
इस प्रकार, जिस स्थान पर ऋषियों ने गड्ढा खोदा था, वह एक विशाल और सुंदर झील में तब्दील हो गया। चूँकि इसे तीन ऋषियों ने मिलकर बनाया था, इसलिए स्कंद पुराण के ‘मानस खंड’ में इसे ‘त्रि-ऋषि सरोवर’ कहा गया है।
नैनी झील का धार्मिक महत्व: मानसरोवर के समान पुण्य
हिंदू धर्म में नैनी झील का महत्व केवल एक पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र तीर्थ के रूप में है।
मान्यता: कहा जाता है कि नैनी झील में डुबकी लगाने या इसके जल का स्पर्श करने से उतना ही पुण्य प्राप्त होता है, जितना तिब्बत की मानसरोवर झील की यात्रा करने से मिलता है।
यही कारण है कि आज भी श्रद्धालु और पर्यटक यहाँ न केवल खूबसूरती देखने आते हैं, बल्कि अपनी आध्यात्मिक शांति के लिए इस पवित्र जल को नमन भी करते हैं।

