क्या आप जानते हैं नैनीताल का नाम ‘नैनी’ क्यों पड़ा? पढ़िए माता सती के शक्तिपीठ और नैना देवी मंदिर की वह पौराणिक कथा

क्या आप जानते हैं नैनीताल का नाम ‘नैनी’ क्यों पड़ा? पढ़िए माता सती के शक्तिपीठ और नैना देवी मंदिर की वह पौराणिक कथा

उत्तराखंड के पहाड़ों के बीच बसी नैनी झील न केवल अपनी सुंदरता के लिए जानी जाती है, बल्कि यह करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र भी है। नैनीताल का नाम और इस झील का अस्तित्व सीधे तौर पर माता सती के एक चमत्कार से जुड़ा है।


पौराणिक संदर्भ: भगवान शिव का वैराग्य और विष्णु का चक्र

पौराणिक कथा के अनुसार, जब राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, तो उन्होंने अपनी पुत्री सती और उनके पति भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। अपने पति का अपमान सह न पाने के कारण माता सती ने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया।

जब भगवान शिव को सती के आत्मदाह का समाचार मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित और दुखी हो उठे। उन्होंने सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाया और तांडव करने लगे। पूरे ब्रह्मांड को शिव के क्रोध से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को 51 हिस्सों में विभाजित कर दिया।

यहाँ गिरी थी माता की ‘बाईं आँख’

माना जाता है कि जहाँ-जहाँ माता सती के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए। इसी क्रम में, आज जहाँ नैनीताल स्थित है, वहाँ माता सती की बाईं आँख (नयन) गिरी थी।

  • नयन से बना नैनी: चूँकि यहाँ माता के नयन गिरे थे, इसीलिए इस स्थान का नाम ‘नयनी ताल’ पड़ा, जो कालांतर में बदलकर ‘नैनीताल’ हो गया।
  • झील का रहस्य: लोक मान्यताओं के अनुसार, जिस स्थान पर माता की आँख गिरी, वहाँ आँसुओं की एक जलधारा फूट पड़ी, जिसने आगे चलकर इस विशाल और सुंदर नैनी झील का रूप ले लिया।

नैना देवी मंदिर: भक्तों की अटूट श्रद्धा

नैनी झील के उत्तरी किनारे पर स्थित नैना देवी मंदिर इसी पौराणिक घटना का साक्षी है।

  1. मुख्य मूर्ति: मंदिर के भीतर माता की दो आँखें (नयन) स्थापित हैं, जिनकी पूजा मुख्य रूप से की जाती है।
  2. ऐतिहासिक पुनर्निर्माण: 1880 में आए एक भीषण भूस्खलन में पुराना मंदिर नष्ट हो गया था, जिसके बाद इसे दोबारा बनाया गया। आज यह मंदिर कुमाऊं के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है।

क्यों खास है यहाँ के दर्शन?

भक्तों का विश्वास है कि नैना देवी के दर्शन मात्र से आँखों के रोग दूर होते हैं और मानसिक शांति मिलती है। झील के किनारे ठंडी हवाओं और मंदिर की घंटियों के बीच जो आध्यात्मिक अनुभव होता है, वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

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