नैनीताल की शांत वादियों और घने जंगलों के बीच एक नाम आज भी गूँजता है— एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट, जिन्हें दुनिया जिम कॉर्बेट के नाम से जानती है। एक ऐसा शिकारी, जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर कुमाऊं के ग्रामीणों को मौत के साये से बाहर निकाला।
जिम कॉर्बेट केवल एक शिकारी नहीं थे, बल्कि वे नैनीताल के लोगों के लिए एक मसीहा थे। आइए जानते हैं उनके जीवन और उन रोमांचक शिकारों के कुछ अनसुने किस्से।
गुर्नी हाउस (Gurney House): जहाँ इतिहास आज भी जीवित है
नैनीताल के अयारपाटा हिल पर स्थित ‘गुर्नी हाउस’ जिम कॉर्बेट का निवास स्थान था।
- विरासत: यह घर आज भी नैनीताल में मौजूद है और एक निजी संग्रहालय के रूप में उनकी यादों को संजोए हुए है।
- किस्सा: कहा जाता है कि कॉर्बेट इसी घर के बरामदे में बैठकर कुमाऊं की पहाड़ियों को निहारते थे और अपनी मशहूर किताबों (जैसे ‘मैन-ईटर्स ऑफ कुमाऊं’) की रूपरेखा तैयार करते थे।
स्थानीय लोग क्यों कहते थे उन्हें ‘गोरा साधु’?
नैनीताल के पुराने बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि जिम कॉर्बेट को लोग ‘गोरा साधु’ या ‘कार्वेट साहब’ कहकर पुकारते थे। इसके पीछे कई कारण थे:
- निस्वार्थ सेवा: वे केवल उन्हीं बाघों या तेंदुओं का शिकार करते थे जो आदमखोर (Man-eaters) बन चुके होते थे।
- सादगी: वे अक्सर नंगे पैर जंगलों में मीलों तक चलते थे और स्थानीय भाषा (कुमाऊंनी) में ग्रामीणों से बातें करते थे।
- मसीहा: जब भी किसी गाँव में आदमखोर का खौफ होता, लोग मदद के लिए सीधे गुर्नी हाउस पहुँच जाते थे।
रोंगटे खड़े कर देने वाला शिकार: ‘रुद्रप्रयाग का आदमखोर’
कॉर्बेट के शिकार की कहानियाँ किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती हैं। एक मशहूर किस्सा है जब उन्होंने एक ऐसे आदमखोर तेंदुए का अंत किया था जिसने सालों तक दहशत मचा रखी थी।
- साहस का परिचय: कॉर्बेट अक्सर रात के सन्नाटे में एक पेड़ पर मचान बनाकर घंटों बैठते थे।
- खतरनाक मुकाबला: कई बार ऐसा हुआ कि बाघ उनके बिल्कुल करीब पहुँच गया, लेकिन कॉर्बेट की अचूक दृष्टि और फौलादी जिगर ने हमेशा जीत हासिल की। उनकी किताबों में दर्ज ‘चंपावत का बाघ’ और ‘चौगढ़ का बाघ’ जैसे किस्से आज भी पाठकों के रोंगटे खड़े कर देते हैं।
शिकारी से संरक्षणवादी बनने का सफर
जिम कॉर्बेट के जीवन का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि वह शिकारी से भारत के सबसे बड़े वन्यजीव संरक्षणवादी (Conservationist) बन गए।
- उन्होंने ही सबसे पहले यह बात उठाई कि बाघ आदमखोर तभी बनता है जब वह घायल हो या उसके प्राकृतिक आवास में भोजन की कमी हो जाए।
- उन्हीं के सम्मान में भारत के पहले नेशनल पार्क का नाम ‘जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क’ रखा गया।

