नैनीताल में होली 2026 की धूम: कुमाऊंनी फागोत्सव और फूलों की होली ने जीता पर्यटकों का दिल

नैनीताल में होली 2026 का उत्सव इस समय पूरे उफान पर है। यहाँ की होली अपनी अनूठी कुमाऊंनी परंपराओं और संगीत के लिए जानी जाती है, जो फरवरी के अंत से ही शुरू हो गई थी।

2026 की नैनीताल होली से जुड़ी मुख्य खबरें और अपडेट्स नीचे दिए गए हैं:

1. मुख्य तिथियां और मुहूर्त

  • होलिका दहन (चीर दहन): 3 मार्च 2026 (मंगलवार)। इस साल होलिका दहन के समय चंद्र ग्रहण का साया भी रहा, जिसके कारण दहन का मुहूर्त शाम 6:47 बजे (ग्रहण खत्म होने के बाद) रखा गया।
  • छलड़ी (मुख्य होली): 4 मार्च 2026 (बुधवार)। इस दिन रंगों और पानी वाली होली खेली जा रही है।

2. ‘फागोत्सव’ का भव्य आयोजन

नैनीताल की प्रतिष्ठित संस्था श्री राम सेवक सभा द्वारा आयोजित 30वां फागोत्सव 23 फरवरी से शुरू हुआ। इसके मुख्य आकर्षण रहे:

  • भव्य जुलूस: तल्लीताल से मल्लीताल तक एक विशाल सांस्कृतिक जुलूस निकाला गया, जिसमें ‘होल्यारों’ ने पारंपरिक वेशभूषा में कुमाऊंनी होली के गीतों पर नृत्य किया।
  • स्वांग प्रतियोगिता: विभिन्न दलों ने ‘स्वांग’ (नाटक) के माध्यम से पलायन, पर्यावरण संरक्षण और मोबाइल के बढ़ते प्रयोग जैसे सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता का संदेश दिया।

3. फूलों की होली (Eco-Friendly Holi)

नैनीताल के कई बड़े होटलों और राम सेवक सभा के प्रांगण में इस बार फूलों की होली का विशेष आयोजन किया गया। लगभग 4 क्विंटल प्राकृतिक फूलों का उपयोग कर पर्यटकों और स्थानीय लोगों ने ब्रज शैली में होली मनाई।

4. कुमाऊंनी होली की तीन शैलियां

नैनीताल और आस-पास के क्षेत्रों में 2026 की होली इन तीन पारंपरिक रूपों में मनाई गई:

  • बैठकी होली: मंदिरों और घरों में शास्त्रीय रागों पर आधारित होली गायन, जो बसंत पंचमी से ही शुरू हो गया था।
  • खड़ी होली: सफेद कुर्ता-पाजामा और टोपी पहनकर टोलियों में गांव-गांव जाकर गाए जाने वाले गीत।
  • महिला होली: नैनीताल में इस बार महिला होली दलों का विशेष उत्साह देखा गया, जिसमें महिलाओं ने अपने विशेष लोक गीतों के साथ इस उत्सव को जीवंत बनाया।

5. पर्यटकों का जमावड़ा

इस साल होली मनाने के लिए नैनीताल के होटलों में 40% से अधिक एडवांस बुकिंग रही। इंदौर, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों से आए पर्यटकों ने कुमाऊंनी संस्कृति का करीब से अनुभव किया।

विशेष नोट: इस वर्ष होली पर चंद्र ग्रहण होने के कारण कई धार्मिक अनुष्ठानों के समय में बदलाव किया गया था, जिसका असर मंदिरों के दर्शन और पूजा के समय पर भी पड़ा।

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