नैनीताल, जिसे आज हम ‘झीलों के शहर’ के रूप में जानते हैं, 1841 से पहले बाहरी दुनिया के लिए एक अनसुलझा रहस्य था। स्थानीय लोग इसे पवित्र मानते थे और यहाँ की शांति को भंग नहीं करना चाहते थे। लेकिन फिर एक अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन (P. Barron) की नजर इस खूबसूरत घाटी पर पड़ी और यहाँ से शुरू हुआ नैनीताल के ‘छोटा विलायत’ बनने का सफर।
Explore More Topics
बैरन ने अपनी डायरी में लिखा था— “1500 मील के हिमालय भ्रमण में मुझे इससे सुंदर दृश्य कहीं नहीं मिला।”
वो रोमांचक शर्त: जब नाव के बीचों-बीच हुआ सौदा
इतिहासकार बताते हैं कि उस समय नैनीताल के आसपास के इलाके के थोकदार नरसिंह (Narsingh) थे। वे अंग्रेजों को यहाँ बसने की इजाजत नहीं देना चाहते थे। पी. बैरन ने एक दिमागी चाल चली।
वह नरसिंह को एक नाव में बिठाकर झील के बिल्कुल बीचों-बीच ले गया। झील की लहरों के बीच बैरन ने नरसिंह से कहा कि वह इस जगह का मालिकाना हक उसे दे दे। जब नरसिंह ने मना किया, तो बैरन ने धमकी दी कि वह उन्हें झील में डुबो देगा या खुद डूब जाएगा। डर और दबाव में आकर नरसिंह ने एक कागज पर हस्ताक्षर कर दिए और इस तरह नैनीताल का नियंत्रण अंग्रेजों के हाथ में आ गया।
क्यों कहा गया इसे ‘छोटा विलायत’?
अंग्रेजों को नैनीताल की ठंडी जलवायु बिल्कुल इंग्लैंड (UK) जैसी लगती थी। भीषण गर्मी से बचने के लिए उन्होंने इसे संयुक्त प्रांत (United Province) की ग्रीष्मकालीन राजधानी बना दिया।
- यूरोपीय वास्तुकला: यहाँ बने कॉटेज, स्कूल (जैसे सेंट जोसेफ, शेरवुड) और चर्च पूरी तरह से ब्रिटिश स्टाइल में थे।
- मल्लीताल और तल्लीताल: अंग्रेजों ने शहर को व्यवस्थित तरीके से बसाया। झील के ऊपरी हिस्से को ‘मल्लीताल’ और निचले हिस्से को ‘तल्लीताल’ कहा गया।
- क्लब कल्चर: नैनीताल बोट हाउस क्लब और फ्लैट्स का मैदान अंग्रेजों की शाम की रौनक हुआ करता था।
इन्हीं कारणों से नैनीताल को ‘लिटिल इंग्लैंड’ या ‘छोटा विलायत’ कहा जाने लगा।
आज का नैनीताल और ब्रिटिश विरासत
आज भी जब आप नैनीताल की सड़कों पर घूमते हैं, तो आपको वहाँ की पुरानी इमारतों में ब्रिटिश काल की झलक मिलती है। गवर्नर हाउस (Raj Bhavan) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो बिल्कुल बकिंघम पैलेस जैसा दिखता है।
पी. बैरन की वो खोज भले ही विवादों में रही हो, लेकिन उसी के बाद नैनीताल दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर चमकने लगा।

