नैनीताल अपनी शांत झीलों और ऊंचे पहाड़ों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसके इतिहास के पन्नों में एक ऐसी डरावनी तारीख दर्ज है जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है। 18 सितंबर 1880—यह वो दिन था जब प्रकृति के कहर ने नैनीताल के एक बड़े हिस्से को मलबे में तब्दील कर दिया था।
आज हम जिस नैनीताल को देखते हैं, उसका स्वरूप काफी हद तक उसी भयानक आपदा के बाद बदला है। आइए जानते हैं 1880 के उस भूस्खलन की पूरी कहानी।
मूसलाधार बारिश और कांपता हुआ पहाड़
सितंबर 1880 के उस सप्ताह में नैनीताल में रिकॉर्ड तोड़ बारिश हो रही थी। लगातार 40 घंटों से अधिक समय तक हुई भारी बारिश के कारण नैना पीक (Naina Peak) की पहाड़ियों ने पानी सोख लिया था और मिट्टी पूरी तरह ढीली हो चुकी थी।
दोपहर के करीब अचानक एक भयानक गड़गड़ाहट हुई और नैना पीक का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे की ओर खिसकने लगा। यह भूस्खलन इतना तेज था कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला।
विक्टोरिया होटल और पुराना नैना देवी मंदिर मलबे में दफन
इस आपदा में नैनीताल की सबसे प्रसिद्ध इमारतें और आस्था के केंद्र पल भर में तिनकों की तरह ढह गए:
- विक्टोरिया होटल का विनाश: उस समय का आलीशान ‘विक्टोरिया होटल’ पूरी तरह मलबे की चपेट में आ गया। कहा जाता है कि होटल में ठहरे मेहमानों और कर्मचारियों को बाहर निकलने तक का समय नहीं मिला।
- पुराना नैना देवी मंदिर: झील के किनारे स्थित माता नैना देवी का प्राचीन मंदिर भी इस भूस्खलन की चपेट में आकर पूरी तरह जमींदोज हो गया।
- जान-माल की हानि: आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस हादसे में लगभग 151 लोग मारे गए थे, जिनमें अंग्रेज अधिकारी और स्थानीय निवासी दोनों शामिल थे।
मल्लीताल फ्लैट्स: मलबे से बना एक मैदान
आज नैनीताल जाने वाले पर्यटक जिस विशाल मैदान (मल्लीताल फ्लैट्स) पर टहलते हैं या जहाँ क्रिकेट और फुटबॉल मैच होते हैं, वह वास्तव में उसी 1880 के भूस्खलन का परिणाम है।
रोचक तथ्य: भूस्खलन के साथ जो भारी मलबा और चट्टानें नीचे आईं, उन्होंने झील के उत्तरी किनारे के एक बड़े हिस्से को भर दिया। बाद में उस जगह को समतल किया गया, जिसे आज हम ‘द फ्लैट्स’ के नाम से जानते हैं।
मंदिर का पुनर्जन्म और नया नैनीताल
इस भीषण तबाही के बाद नैनीताल को फिर से बसाने की कोशिशें शुरू हुईं:
- नया नैना देवी मंदिर: 1882-83 के दौरान मंदिर का पुनर्निर्माण उसी स्थान के पास किया गया जहाँ वह आज स्थित है।
- ड्रेनेज सिस्टम: इस हादसे से सबक लेते हुए अंग्रेजों ने नैनीताल के पहाड़ों पर नालियों (Drains) का एक जाल बिछाया, ताकि भविष्य में भारी बारिश का पानी सीधे झील में जा सके और मिट्टी न धंसे।

